जगी नयन की नक्काशी पढ़ी है कभी
हर पल उसमे डूबा हुं मै,

झुके नयन के लहज़ा देखा है कभी
उसने हर पल छला है मुझे,

कभी मेहताब तो कभी ख्वाब में ही सही
काश ये मेरे लिए होता हज़रत।

काश उसके पलकों का एक धागा हमसे जुड़ा होता हज़रत।
 
  - Crinctum