कुछ तरंगें हृदय कंपन को इजहार कर देती है,
वादों के खेल में प्यालों को पार कर जाती है,
जां न छोड़ती है भीतर,
किरदार उसका बाण आभास होती है।
खैर छोड़ो कुछ बातें बस बकवास होती है।
वो जो होता है यूं ही, कुछ भी,
वही है उन शब्दों की अहिमियत,
जलते तबे पर बूंदों सा बदहवास होती है।
खैर छोड़ो कुछ बातें बस बकवास होती है।
भावों को धारा में बहाती है,
किसी किनारे पे पटक देती है,
जब तक नयननीर गिरे न कपोलों पर,
बड़ी ऊंची आस होती है।
खैर छोड़ो कुछ बातें बस बकवास होती है।
सोचता हूं मै भी करू कुछ ऐसे बातें,
फिर सोचता हूं,
खैर छोड़ो कुछ बातें तो बस बकवास होती है।

