कौन कहता है कि हक मिल गया है बेटियों को
हमने तो आज भी उन्हें सहते देखा है
कौन पूछना चाहता है खुशियां उनकी
मैंने तो आज भी उनको अर्पण करके देखा है
सोचता हूं कि इन सब का गुनहगार कौन है आखिर
मैंने तो अपने जैसे कई चेहरा को इसमें देखा है
कब तक मांगेंगे इन बेटियों से कुर्बानियां हम
क्या कभी किसी ने इस बात की तरफ भी सोचा है
हंसी आती है उन पर जो कहते हैं जमाना बदल रहा है
ढूंढता हूं वह शख्स से जिसने अपनी बेटियों की ओर देखा है
कौन कहता है कि हक मिल गया है बेटियों को
हमने तो आज भी उन्हें सहते देखा है
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