फिर बदला कुदरत का कानून,
सच का भेष लिए आया एक ओर गद्दार।
गलती कुछ ना थी हमारी ,
सबूत दिया थे बेगुनाह-ए-हकीकत ।
पर ये नकाब पहने हुए तख़्त के बादशाहों ने,
सच को वक़्त की परछाई में काला कर दे मारा।
गलत ना थे हम , थे वे क़ुदरत के गदारों ।
पानी में सच पाक दिखता हैं,
गद्दारों का चहरा साफ दिखता हैं।
अपनों के भेष में दिखता धोखा हैं,
धोखे का स्वरूप दिखाता धोखा हैं।
_इत्तु सा


