*** गुब्बारे ***
अपनी खिड़की पर बैठी वो अक्सर आते जाते लोगोों को देिती रहती थी पर पूरे ददन वो इोंतेजार करती थी गुब्बारे वाले का .रोंग दबरोंगे गुब्बारे ले कर जब वो गली में आता था, तो मुहल्ले के सारे बच्ोों के चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती थी..वो भी िुशी से खिल जाती थी.आँिोों में मानो कोई चमक आ गयी हो|
पता नहीों, ऐसा क्या था इस पल में, दक वो सब कुछ भूल कर उसमें िो जाती थी.वो अलग अलग रोंगो के गुब्बारे मानो कई सपने ले कर आते थे.. उड़ते हुए यहाँ वहाँ फुदकते हुए सपने..
एक ददन शाम हो गयी पर गुब्बारे ले कर कोई नहीों आया.
वो खिड़की पर आती और हर बार दनराश हो कर वादपस चली जाती.
रात हो गयी . आज वो नहीों आया. वो एक पल, दजसका वो पूरा ददन इोंतजार करती थी .. आज नही आया..
अरे!ये क्या? अगले ददन सुबह सुबह घोंटी बजाते हुए गुब्बारे वाला आया है .अरे वाह!आज तो कई आकार के गुब्बारे हैं | गली में ऐसे गुब्बारे पहले दकसी ने नहीों देिे थे| दफर क्या था, बच्ोों की भीड़ लग गयी.
इतना शोर सुनकर वो खिड़की की तरफ भागी. उसके चहरे की िुशी देिने लायक थी| आज गुब्बारे वाला उसकी खिड़की पर आया और पूछा:
“कौन सा गुब्बारा चादहए दबदटया” ?
वो बोली” नहीों नहीों. मैं क्या करँगी गुब्बारे का बाबा..चाची कहती हैं" ये गुब्बारे सपनोों की तरह होते टूटने वाले सपने. मुझे नही चादहए..
गुब्बारे वाले ने पूछा “और माँ क्या कहती है”
अचानक उसकी वो आँिोों की चमक कहीों ओझल सी हो गयी. वो बोली “माँ तो नहीों है”ये कहकर वो अोंदर भाग गयी|
गुोंबरे वाला थोड़ी देर तक खिड़की से उसे देिता रहा और दफर एक गुब्बारा वहीों खिड़की पर बाँध कर चला गया.
साथ में एक कागज भी लगा गया,दजस पर दलिा था:
"सपने टूटने के डर से सपने देिना नहीों छोड़ाकरते लाडो
तुम्हारी माँ"..
गुब्बारा दमलते ही मानो उसे दुदनया का सबसे बड़ा ख़जाना दमल गया हो|और वो कागज,वो कागज उसने आज भी सोंभाल के रिा है.


