वैसे तो मुझे अपने ननिहाल में रहने का बहुत अवसर नहीं मिला न ही मैंने उतना समय वहां व्यतीत किया है। फिर भी मुझे अपने नाना की एक अस्पष्ट और विस्तृत छवि याद है।
मुझे इस बात का गर्व है की मुझे एक ऐसे परिवार में जन्म लेने का अवसर मिला है जिसमे मेरे पिता पक्ष तथा मेरी माता पक्ष के अर्थात मेरे दादा और दादी और मेरे नाना एवं नानी दोनों ही तरफ से एक विशाल छवि के लोगों की ख्याति सुनने मिली।
मैने अपने दादाजी को कभी नहीं देखा मगर मेरा बचपन मेरी दादी के सानिध्य में बीता है मैंने काफी लंबा समय उनके साथ गुजारा है।
मुझे अपने नाना की एक धुंधली सी छवि ही याद है।
बात तब की है जब मैं अपने गांव में रहा करता था शायद कक्षा पांच में था मैं।
मेरे नाना मेरे गांव आए थे, वो एक छः फीट के करीब की समृद्धशाली कद और चेहरे पर एक बड़ी सी मूंछ जो बिलकुल व्यवस्थित और उनकी छवि के अनुरूप।
मेरे गांव में सब उन्हें जमादार साहब कहा करते थे क्योंकि उन्होंने लंबे समय तक उस पद पर कार्य किया था । मैं हमेशा जमादार साहब का नाती के नाम से संबोधित किया जाता था।
मेरे गांव के बाजार पर एक मिठाई की छोटी सी फूस वाली दुकान थी जिसमें वो अक्सर चाय पीने जाया करते थे । कभी जब वो जल्दी आ जाया करते थे तो मुझे विद्यालय से लौटने के क्रम में उसी दुकान पर मिलते थे।
मेरे हाथों में ढ़ेर सारे पेड़े उस दुकान से खरीद के दिया करते थे और कहते की घर पर सभी को देना।
मेरा अनुराग नाना से जितना था उतना पेड़े से भी रहा। मैं घर तक आते तक उसमे से लगभग आधा खा जाया करता था।
कई दफे जब मैं अपने ननिहाल जाता था तो उन्होंने अपने रहने के लिए एक बेहद स्वच्छ और एक सुव्यवस्थित कुटियानुमा बना रखा था जहां वो रहते ।मेरी मां बताया करती थी की उसमें जाने में भी उनलोगो को डर लगता था जो मेरी समझ से डर नहीं उनके बीच एक संबंधों की मर्यादा रही होगी। उसके पीछे एक नींबू का पेड़ था जिस पर ढ़ेर सारे नींबू लगते थे और हम जब भी गए वहां तो उसका इस्तेमाल करते ही साथ ही घर भी लाते थे ।
आज भी जब कभी उनकी छवि का वर्णन कानों में सुनने को मिलता है तो गर्व होता है ऐसी शख्सियत के नाती होने पर...
शायद उनका एक अंश होकर भी उनके जैसा बनना एक असाधारण संकल्पना है।
उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धा सुमन।।
