पिताजी


उस दिन शायद मुझे 

अपने पिताजी को गले लगाना चाहिए था 

जिस दिन मैंने उन्हें तुम्हारे बारे में बताया 

और उन्होंने कहा, " ठीक है, हमें कोई दिक्कत नहीं है" 


और शायद उस दिन

जिस दिन तुम्हारा विवाह था

और मेरे पिताजी ने मेरे कंधे पे हाथ रखते हुए कहा " ऐसा कर कहीं घूमने चले जा कुछ दिन, मन हल्का होगा, पढ़ाई-बढ़ाई तो बाद में भी होती रहेगी"


कितने ही दिन, कितने ही महीने, विरह की पीड़ा में काट दिए 

पर वो पीड़ा हमेसा उस पीड़ा के सामने कम लगी

जिस दिन मैंने पिताजी को दर्द में रोते देखा

उस दिन शायद मुझे पिताजी को गले लगाना चाहिए था 

और कहना था, " कुछ दिन में ठीक हो जाओगे तुम" 

पर मैं पिताजी को मौन खड़े बेबस देखता रहा करहाते हुए


कितने ही अवसर आए, कितने ही मौके मिले

किन्तु मैं और पिताजी कभी गले नहीं मिले

माँ से लड़ भी लेते हैं और गले भी मिल लेते हैं

पिताजी से न लड़ाई होती है, न गले लगा जाता है