उनके!!
फरमान भी उनके ख़्वाहिशें भी उनकी- उम्मीदें जगा के,
बंदिशें भी उनकी- एक अज़ब की कोलाहल मची है
इस कौम में-
प्यार भी उनके- नफरत का दामन भी
उनके- सच्चाई की बात भी उनके,
झूठे सारे वादे भी उनके!
जाये तो जाये हम कहाँ- गरीबी पर बात भी उनके,
ग़रीबो के पेट पे लात भी उनके!
जुमलें भी उनके- आम आदमी पे हमलें भी उनके!
क्या इस कौम में आम इंसान की कोई हैसियत नहीं,
क्या इस कौम में हमारी कोई अहमियत नहीं?