वक्त की नाव में बैठकर मजधार में बह जाने दो,
कसक थोड़ा ज्यादा है जख्म को सब्र आने दो !
क्या हुआ जो अपने अपने ना रहे कहने सुनने के लिए,
धागे तोड़ दो और रिश्तों को छितिज में उड़ जाने दो! तकलीफें तो होंगी ही जब लहू टूटेगा लाठियों से,
बांस की छड़ियों को थोड़ा धूप में पक तो जाने दो! मन कभी तन्हा होता नहीं ये किसने कह दिया,
महफ़िल में एक्पाल को दिल को सुकून तो पाने दो!

