जीवन भर तपता जो,

सब की है सुनता जो,

मन में ही गुनता जो,

वही तो पिता है..


कर्म की कुदाल से,

राहें बनाता सबकी,

चोट अपना देता कोई,

चुपके से सह लेता है..

वही तो पिता है..


दर्द जब बढ़ जाता है,

मन में ना समाता है,

कहता नहीं किसी से,

चुपके से रो लेता है,

वही तो पिता है..


बाग का माली वह,

सबके लिए जीता जो,

जीवन उपहार देता,

फिर भी रहे रीता जो,

वही तो पिता है..


घाव छुपा लेता जो,

आह नहीं करता वह,

अपनो से चोट खा,

बस वाह वाह कहता है,

वही तो पिता है..


सहता है घुटता है,

जीवनभर लुटता है,

कह नहीं सकता वह,

क्योंकि वह पिता है..