प्रिय तुम ही मम प्राणाधार

प्रकृति के आवर्तन उस पार

मिलन का प्रांगण करे पुकार

तुम्हारा अप्रतिम है यह प्यार


विकल मन मै आश्रय तुम एक

नयन आतुर होते है देख

फिर कहो कैसा यह व्यतिरेक

मिलन से करदो तुम अभिषेक


ईश की उत्तम कृति तुम सिद्ध

प्रणय में तेरे हो आबद्ध

हो गया मैं भी तो जन श्रेष्ठ

गुणों में हूं ना ही मै जेष्ठ


अमृत पद की ना कोई आश

जगत की कोई ना अभिलास

विश्व में तुम सा ना कोई खास

सिर्फ तेरी है मुझको प्यास..