कहने को तो बहुत कुछ कहती हैं तेरी आँखें,

पर अक्सर खामोश ही रहती हैं ये तेरी आँखें !

यूँ तो सावन को बरसते देखा है जी भर मैंने,

बरसकर सावन भी भीगा देती हैं ये तेरी आँखें !

चस्म- ऐ- मंजर तमाम कैद होंगे तेरी आँखों में,

पर ख्वाब कुछ एक ही सजाती हैं ये तेरी आँखें !

गुजरती हैं किसी तीर की माफिक तेरी नजर पुष्पक,

तीरे- नजर- ऐ- शिकार कर जाती हैं ये तेरी आँखें !

मिला ताउम्र को सुकूँ-ऐ-मकाँ पलकों के दरमियाँ,

गैर हूँ अपनेपन का एहसास दिलाती ये तेरी आँखें !

तनहा सा महसूस करता हूँ महफ़िल में भी ऐ चित्रा,

देखके नजर दिले-अर्स पे बिठाती है ये तेरी आँखें..