सत्य और असत्य मिले किसी पड़ावदोनों में हुआ भीषण वार्तालाप 

असत्य कहे तू कटु नीम समान

मैं मीठी मिश्री हूँ सबकी जान 

तू कठोर करे वज्र प्रहार

मैं रेशम कोमल सुकुमार 

जो रहता मेरी छत्र-छांव

अभाव न धरे उसके घर पाँव 

अडिग रहकर तू क्या कभी पाता

मैं झुक कर हूँ खूब अघाता 

तुम्हें प्राणप्रिय हैं सिद्धांत

मुझे सका कौन इनमें बांध 

सत्य सिंह गर्जना से बोला

सुन असत्य ना बन भोला 

मेरी कटुता है नीम समान

रोगों के जो हर ले प्राण 

कठोर हूँ जो वज्र के जैसा

सत्यवादी को भय मुझसे कैसा 

तेरी छाँव में जग भरमाता

क्या कोई है जो मुक्ति पाता 

अडिगता का रस तू क्या पहचाने

वीरों की महिमा तू धूर्त भी जाने 

सिद्धांत हीन नर पशु समान

तू बिकाऊ तुझको क्या ज्ञान 

चार युगों ने गाई यही कथा

असत्य हारा सत्य से सदा 

सत्य पताका लहराती अविराम

असत्य है विनाश का दूजा नाम 

सत्य के सुन प्रचण्ड बोल

असत्य रहा था स्वयं को तोल