ओस की बूंदों सी,
मलय समीर सी वह,
अपनी सी लगती वह,
शर्मीली सी लड़की..
संग में मन मौज लिए,
खुशियों की फौज लिए,
मन को ललचाती वह..
बलखाती लड़की..
इठलाती नदिया सी,
दिल को हरसाती,
मुरझाए मन को भी,
प्रफुल्लित कर जाती..
आंखें नशीली उसकी,
चाल है छबीली उसकी,
मानो मय खाने का,
जीवित पैग़ाम वह..

