सपनें हैं वो मेरे कोई ख्वाहिश नहीं,
जिन्हें भूलकर मैं नज़रें अपनी हटा लूं..
ज्वाला है वह,जो अन्तर्मन में धधक रहा मेरे।
कोई लौ नहीं एक छोटे-से दिये का,
जिसे फूंककर मैं बुझा लूं..
वर्षों सींचा मैंने जिस बीज को,
धैर्य और साहस से अपने।
पहचान है वो मेरे सीरत का,
कोई दाग नहीं दामन पर मेरे, जिसे छुड़ा लूं..
सपनें हैं वो मेरे कोई ख्वाहिश नहीं,
जिन्हें भूलकर मैं नज़रें अपनी हटा लूं..
माना कि, पगडंडियां हैं संकरी,
और कांटें भी हैं राहों पर बहुत।
पर लक्ष्य है यह अंतिम जीवन का मेरे,
कोई लालच नहीं इस मन का जिसे ठुकरा दूं..
सपनें हैं वो मेरे कोई ख्वाहिश नहीं,
जिन्हें भूलकर मैं नज़रें अपनी हटा लूं..
