प्यासा पंछी, उड़ता मन..
यह, मन प्यासा, पंछी मेरा
नील गगन उड़ करे बसेरा।
पल मे देश विदेशों विचरण,
कभी रुष्ट, पल मे अभिनंदन,
प्यासा पंछी, उड़ता मन..
पल में अवध, परिक्रम करता,
सरयू जल अंजुलि में भरता।
पल में चित्र कूट जा पहुँचे,
अनुसुइया के आश्रम पावन,
प्यासा पंछी, उड़ता मन..
पल में शबरी आश्रम जाए,
बेर,गुठलियाँ ढूँ ढे खाए।
किष्किन्धा हनुमत से मिलकर,
कपि संगत वह करे जतन,
प्यासा पंछी, उड़ता मन..
पल में सागर तट पर जाकर,
रामेश्वर के दर्शन पा कर।
पल मे लंक, अशोक वाटिका,
मिलन विभीषण, पहुँच सदन,
प्यासा पंछी, उड़ता मन..
पल मे हनुमत के संग जाता,
संजीवन बूटी ले आता।
मन पल मे हीें रक्ष संहारे,
पुष्पक बैठ अवध आगमन,
प्यासा पंछी, उड़ता मन..
राजतिलक और रामराज्य के,
सपने देखे कभी सुराज्य के।
मन पागल या निशा बावरी,
भटके मन, घर सोया तन,
प्यासा पंछी, उड़ता मन..
मै सोचू सपनों की बातें,
मन की सुन्दर, काली रातें।
सपने में तन सोया लेकिन,
रामायण पढ़ करे मनन,
प्यासा पंछी, उड़ता मन..
मेरे मत मन, तन से अच्छा,
प्रेम-प्रीत की रीत में सच्चा।
प्रेमी, बैरी, कुटिल, पूज्यवर,
सबके मन को करे नमन,
प्यासा पंछी, उड़ता मन..

