देखा जब पहली बार तुम्हें

मन उड़ा खोल अपना वितान

संघर्ष मार्ग पर चलना था

मिल गया मुझे जीवन विहान।

तुम शरमाती रहती मुझसे

मैं भी कुछ बोल नहीं पाया,

हर जगह तुम्हारी ही यादें

हर जगह तुम्हारी ही छाया।

मैं भी कितना किस्मत वाला

फिर डोर बंधे जीवन साथी

मेरे दुख में संघर्षों में

तुम साथ चले दीपक बाती।

वर्षों बीते जैसे कल हो

तेरा मेरा का भेद नहीं

तुम निश्छल निर्मल भोली सी

दुख में बिखेरती मधुर हंसी।

है याद मुझे उस दिन तुमने

कैसे विह्वल हो बात किए

फिर शाम हुई तुम मौन हुए

प्राणों के संकट झेल लिए।

तुम कभी न पल भर दूर हुई

सांसों से सांसें आत्मसात,

तुम अमर प्रेम की वेदी पर

हो गई समर्पित भस्मसात।

जीवन सागर की लहरों में

मेरा मन एकाकी प्रियतम,

तुम मूर्त प्रेम साहस भर दो

कर्तव्य न मेरा होवे कम..