बारिश के झिलमिल परदों से झांकता मन

आसमां की बेचैनी को निहारता सा मन

धरती के आंचल संग मुस्कुरामे लगा

जैसे स्नेह को बादल बरसाने लगा

पेड़ो की शाखाओं पे ठहरती सी बूंदे

जैसे हथेलियों को चूमें आंखे मूंदे

सीप में बंद मोती सा मन

आज खुद को आकार देने लगा

ख्वाहिशों की लहरों में हलचल संजोने लगा

इंद्रधनुष से रंग संवर गए आंखो में

सजीले नयन आज निखर गए बातों में

जमीं की चाहत को ज्यों पुकारता गगन

मन का मयूर नृत्य करे होके मगन

बारिश के झिलमिल परदों से झांकता मन

आसमां की बेचैनी को निहारता सा मन