जब सूरज पूरब से पश्चिम 

तक चल चल कर थक जाएगा 

और जहाँ धरती अम्बर से 

मिलती है उस तक जाएगा 


चारो ओर सुनहला मौसम 

और सुनहली लाली होगी 

और लौटते पंछी होंगें 

खेत-खेत हरियाली होगी 


दिन भर के सब थके थके से 

अपने घर को जाते होंगे 

कभी झूम कर कभी मन्द से 

पवन बाग लहराते होंगे 


तुम भी उसी बाग के पीछे 

आकर उसी आम के नीचे 

झूम-झूम कर मेरे ऊपर 

तुम खुद को लहराओगी ना 

सच सच बोलो आओगी ना 


जब बसन्त में भाँति-भाँति के 

सुंदर-सुंदर फूल खिलेंगें 

और प्रणय के इस मौसम में 

नेह मेह अनुकूल मिलेंगे 


अनुकूलन के इस मौसम में 

जब आम-आम बौराएँगे 

जब बाग-बाग में कली-कली 

भौंरे-भौंरे मडराएँगे 


जब-जब शाखों पर मस्ती में 

कोयलें कुँहुक कर गाएँगीं 

और ओस की बूँदे गिरकर 

चाँदी की सी बन जाएँगी 


बोलो प्रिये ताल के पीछे 

हाँ-हाँ उसी आम के नीचे 

मेरी बाहों के घेरे में 

सुंदर गीत सुनाओगी ना 

सच सच बोलो आओगी ना..