तुम हो गगन की पूर्णिमा,
मैं धरा का घनघोर जंगल।
तुम हो पर्वतों की उरूज श्रृंखला,
मैं घाटियों का भू-भाग समतल।
तुम हो क्षितिज की क्षद्म भंगिमा,
मैं चक्षुओं का शोक निर्मल।
तुम हो प्रणय की दीप्त ज्योति,
मैं हृदय का मेघ चंचल।
तुम हो प्रीति की बोल मीठी,
मैं विरह का राग विह्वल।
तुम हो यज्ञ की उक्ष समिधा,
मैं अग्नि का क्रोध आकुल।
तुम हो प्रेम की अनमोल मोती,
मैं समुद्र का सीप निश्छल।
