अपने घर हम जाएँ नहीं, तो,
बोलो ना, किसकी दर जाएँ
सरकार.... कहो तो मर जाएँ
मात दिए हैं रोज़ ही यम को
कम मत समझो तुम इस दम को
बस तुम इतना बता दो हमको
कष्ट ये कैसे हर जाएँ
सरकार.... कहो तो मर जाएँ
चलते-चलते रहे हैं गिर भी
खुद पर बीती सह लें फिर भी
पत्नी-बच्चों का कष्ट जो काटे
कह दो, ऐसा क्या कर जाएँ
सरकार.... कहो तो मर जाएँ
धूप में धधके मेरा बच्चा
रोज़ जले ये इससे अच्छा
एक बार चिता में जल जाएँ
कुछ कर दो जिससे तर जाएँ
सरकार.... कहो तो मर जाएँ
भटक रहें हैं यूँ हम दर-दर
आँख से आँसू बहते झर-झर
माँग लो हमसे जीने का कर
सिर काट के अपना धर जाएँ
सरकार.... कहो तो मर जाएँ
खुद अपनी किस्मत से डरते
भूख प्यास से बिल-बिल करते
रोज ही हैं हम तिल-तिल मरते
मृत्यु से कैसे डर जाएँ
सरकार.... कहो तो मर जाएँ
अपने घर हम जाएँ नहीं, तो,
बोलो ना, किसकी दर जाएँ
सरकार.... कहो तो मर जाएँ
# चेतन " अड़भंगी "
# sundaypoet


