[आप भी अपनी कविताएँ साझा कर सकते हैं: काविशाला ]
तूफानों से आँख मिलाओ सैलाबों पे वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तैर के दरिया पार करो
- डॉ. राहत इंदौरी
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारों
- दुष्यंत कुमार
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
- अल्लामा इक़बाल
सफ़र का एक नया सिलसिला बनाना है
अब आसमान तलक रास्ता बनाना है
- शहबाज़ ख़्वाजा ग़ज़ल:
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
- अल्लामा इक़बाल
झुक कर सलाम करने में क्या हर्ज है मगर
सर इतना मत झुकाओ कि दस्तार गिर पड़े
- इक़बाल अज़ीम
हयात ले के चलो काएनात ले के चलो
चलो तो सारे ज़माने को साथ ले के चलो
- मख़दूम मुहिउद्दीन
जला वो शमा कि आँधी जिसे बुझा न सके
वो नक़्श बन कि ज़माना जिसे मिटा न सके
- शफ़ीक़ जौनपुरी
कारवाँ के चलने से कारवाँ के रुकने तक
मंज़िलें नहीं यारो रास्ते बदलते हैं
- सहबा लखनवी
सुना है अब भी मेरे हाथ की लकीरों में
नजूमियों को मुक़द्दर दिखाई देता है
- अमीर क़ज़लबाश
ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
- बशीर बद्र
हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे
- अहमद फ़राज़
सफ़र की धूप में चेहरे सुनहरे कर लिए हम ने
वो अंदेशे थे रंग आँखों के गहरे कर लिए हम ने
- साक़ी फ़ारुक़ी
सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया
भटक गया तो नया रास्ता निकल आया.
- राजेश रेड्डी
हद से बड़ी उड़ान की ख्वाहिश तो यूँ लगा
जैसे कोई परों को कतरता चला गया
मंज़िल समझ के बैठ गये जिनको चंद लोग
मैं एैसे रास्तों से गुज़रता चला गया
- वसीम बरेलवी
आबाद अगर न दिल हो तो बरबाद कीजिए
गुलशन न बन सके तो बयाबाँ बनाइए
- जिगर मुरादाबादी


