खाली दिल का एक कोना हो गया है...
रोज़ का हँसना, रोज़ का रोना हो गया है..
फसलों मे उगता सोना मिट्टी हो चला
कोई मिट्टी मे मिलके सोना हो गया है...
खेला जा रहा है इंसानों कि जिंदगी से
आदमी जैसे कोई खिलौना हो गया है...
हो रही है मासूमियत हवस का शिकार
फूलों का कांटो पे बिछौना हो गया है...
हासिल नहीं है अब कुछ भी यहाँ
ख़ुद को पाना, खुद को खोना हो गया है...