हे पुरुष! तुम मत लिखना केवल 
स्त्री की देह-मात्र पर कविताएँ,

नयन, मृगनयनी लिखने से पहले
झाँकना उनमें झिलमिल स्वप्न-दीप

घने केशों की चंचल लटाओं से पहले,
अधरों की हँसी संवारने की इच्छा रखना

चेहरे के नूर पर ग़ज़लें कहने से पहले
लिखना एक श्लोक स्त्री की मेधा शक्ति पर।


स्वरचित 
© चारु चौहान