ये मौसम की मार है या चेतावनी है मनुष्य को,
कहते है विश्व में महामारी आयी है, पर ज़रा समझो तो इसके पीछे के रहस्य को;
ये मेरा है, ये तेरा है, ये मजहब है, ये धर्म है...
इन्हीं परिभाषाओं के साथ जीते, इन्हीं को व्याख्यायित करते;
पर कभी किसी ने सोचा कि इन सबका परिणाम क्या है(?)
चारो ओर आडंबर का भाव है, विश्व कल्याण के पीछे भी;
पर ज़रा इन बेजुबानों की खामोशी को तो समझते भी।
चाहिए क्या था, मांग क्या थी - इनकी भी;
बस वही प्राकृतिक वातावरण, जो ज़रूरी है तुमको भी।
अलग सी बेचैनी है, अलग सा शोर भी;
ये ओर कुछ नहीं कोर मानसिकता है, मनुष्य की।
क्या याद है वो समय (?) जब सवेरे सूरज की किरण के साथ पक्षियों की अवाजे भी आती थी;
पर अब ज़रा कोई बता सकता है, कितना समय बीत गया चिड़िया की चीं-चीं को भी।
पर प्रकृति है ये, पाठ पढ़ाएगी तुमको ये ही;
तुमने तो अनदेखा किया था, पर अब उठाएगी भी ये ही।
अभी भी मौका है संभालने का, अभी भी मौका है सुधारने का; प्राकृतिक वातावण के साथ खुद को भी,
पर इससे उससे न होकर शुरुआत तो होगी 'मुझसे' ही।।
चारु जैन


