हां! मैं बड़ी हो गई, अपने पैरो पर खड़ी हो गई

लेकिन क्या बर्दाश्त है ये; उन निम्न मानसिकता वाले पुरुषों को(?)

हां मै पतंग जैसी थी, मेरे भी कुछ सपने थे,

क्या गलती थी पता नहीं.. पर जिन्होंने डोर काटी वो भी मेरे अपने थे।।

लड़की अब बड़ी हो गई! घर में अब ठीक नहीं पर उनसे एक सवाल है

२ दिन की बच्ची भी, है अब सुरक्षित कहीं?

दुपट्टा ज़रा सम्भाल कर, आंखो में शरम रखो!

लड़कियों को निर्देशित करने वालो, लड़को पर भी तो ज़रा नियंत्रण रखो।

फूलो की कली जैसी थी, पापा का नाम करना चाहती थी!

पर ये मुमकिन तब था, जब कली को खिलने का मौका मिलता।।

पानी की कलकल सी बहना मै भी चाहती थी, 

इस खुले जहां को छूना मै भी चाहती थी।

सब उमंगों और तरंगों का आसमान मुझे भी प्यारा था!

पर समाज में लड़का-लड़की के भेद का 'नजरिया' ही न्यारा था।।

                        चारु जैन।।