हलचल थी चारो ओर,
कही से आवाज़ आयी-फिर से बेटी हुई है;
मुझे तो ये कहा गया था कि,
उस दुनिया मे परिवार मिलेगा;
पर यहां तो मेरे आने तक कि खुशी नहीं थी!
शायद यहां आस थी, मेरे भाई की;
पर क्या करूं आदेश तो फरिश्तों का आशीर्वाद था,
मां ने मुंह फेर लिया, पापा ने गर्दन झुका ली!
रिश्तेदार-पड़ोसियों की अलग सी हंसी थी;
क्या मुझसे कोई गलती हुई थी(?)
क्या मैने कुछ कहा या किया था(?)
मुझे तो बस भेजा गया था! ना जाने फिर क्यूं -सब ने यूं मुंह फेर लिया!
मुझे तो कारण तक नहीं पता था -पर ना जाने क्यूं (?) कई सवालों ने मुझे घेर लिया।।
-चारू जैन।
