भूख लगने पर सबको चाहिए कुछ आहार;

चाहे वो मास मच्छी हो या फिर हो सब्जी अनार।

विडम्बना ये कैसी है, प्राणी-प्राणी को खा रहा;

फल सब्जियों की क्या कमी थी(?) जो अब बेजुबानों की बली चढा रहा।

कभी गलती से चोट तुम्हे भी लगी होगी, ज़रा याद करो उस पीड़ा को;

फिर क्यूं केवल मानसिकता के पीछे, तड़पा रहे इन जीवों को।

तुम्हारी इस नासमझी का परिणाम ही तो है - जो विश्व आज है भुगत रहा;

प्राकृतिक आपदाएं क्या कम थी, जो अब महामारी से भी जूझ रहा।

परिणाम ही तो है, तुम्हारी जीभ के स्वाद का;

पर इन जीवों को खाने वालो अंदाज़ा भी है उस दर्द के एहसास का।

अभी भी नहीं रुके, तो हो जाएगी बहुत देर;

पहले पशुओं का व्यापार किया पर अब कही लग ना जाए लाशों के ढ़ेर।।

                       चारु जैन।।