मैं मानता हूं लिखने के लिए 

उस पल को जीना जरूरी है,

पर मैं आज भी उन पलो को 

लिखता अा रहा हूं जो हम 

साथ जी सकते थे,

क्योंकि ‘मैं’ उतना ही लिख पाया

जितने में ‘तुम’ थी 

और ‘तुम’ उतना ही पढ़ सकी

जितने में ‘मैं’ था

लेकिन ‘मैं’ फिर भी उन पलों को

लिखने में तरजीह देता हूं 

जितने में “हम” थे या हो सकते थे।


-चर्चित गंगवार