प्यार - नदी या समन्दर 


ये दिल तुम पे आ गया है

 पर पेहले तुम्हारि दिल 

की हाल जान ने को ये दिल 

      बेकरार है ।।

क्या सच में है प्यार

या बस यूंही तुम हो

और मैं हू समन्दर

के दो किनारे की तरह ।।


जो कभी कहीं जाकर मिलते है

ऐसा लोग कहते हैं

परि कभी मिल नहीं पाते है

तो क्या यही है अपना नसीब

या फिर तुम सागर बन जाओ  

     और मैं नदी

कभी मिलेंगे केसी दिन

और मिलके बस एक हो जाएंगे

किसी सुनसान सी जगह पर

इस दुनिया से दूर

बस तुम होगे और मैं

और होगा बस सुनसान गलियों से

  निकलता हवा की आवाज ।।


क्या सच में मिलेंगे हम नदी की तरह 

  या फिर अपने नसीब में समन्दर ही लिखा है।।