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जीवन


खुब तरक्क़ी की आसमां तक पहुँच गयेजमीं पर ही जीवन है ये कैसे भूल गये

इमारतों की चाह में शज़र बर्बाद होते गयेजीने को आँक्सीजन ही लगती है कैसे भूल गये ।।

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