ऐ देश के लोगों ज़रा ध्यान दो इस तरफ, लुट रही है मर्यादा तुम भटक रहे किस तरफ, यत्नों से शहीदों ने जिसको, अपने लहु से सिंचा था, वह और कुछ नहीं, तेरा देंह सरीखा था, बापू, सुभाष, आजाद ने जिस माटी का था मान किया, क्षण- क्षण भर कर रोस देंह में, था अपना बलिदान किया, गोरों ने भर कर गोले, दाग़ दिये थे माटी पर, शहीदों ने आकर थाम लिया, न गीरने दिया था कांटी पर, इसलिए स्वतंत्रता मना रहे, तुम घर, आंगन, चौपाटी पर, अरे! मन में अपने झांक कर देखो, तुम हो किस परिपाटी पर? युद्ध हुआ है समाप्त नहीं, हां बदल गया है रंग इसका, पहले था यह सामने, अब छिप गया है दल इसका, स्वतंत्रता दिवस मनाते हो, क्या स्वतंत्रता से है प्यार तुम्हें? यदि समझते हो ऐसा, तो करनें हैं सपने साकार तुम्हें।