आशाओं की अटल क्षितिज पर,
ज्वलंत स्वप्नों के झर-झर कण,
जब उसे रौंद कर आगे बढ़ते हैं,
अमूल्य जीवन निधि तब खोते हैं,
इसलिए उसे दुःख होता है,
भिखमंगा रोता है।
फटे वसनों से तन को ढ़कता,
रात दिन मछली सा तड़पता,
हाथ पसारे दर -दर भटकता,
फिर भी न एक निवाला मिलता,
"दूर दुष्ट" हर पल सुनता है,
भिखमंगा रोता है।
भिखमंगा सोता है।
दरिद्रता के जीवन को सेता,
पाप-ताप का जीवित लेखा,
निष्ठुर दुनिया के रहम को तरसता,
हाड़ मांस का ढ़ांचा सस्ता,
थक कर भू पर असहाय गिरता है,
भिखमंगा सोता है।
भिखमंगा रोता है।