तोड़ क्यूं नहीं देती इन बंधनों को
जो रोकते है तुम्हारे ख्वाबों को,
तुम्हरी सांसों को
इतना जरूरी तो नहीं सबकी शर्तों पर जीना
खुद के सपनों को मार कर
दूसरों के दुखों को जीना।
क्यूं नहीं तोड़ देती इन जंजीरों को
जो बांध देती हैं तुम्हारे पैरों को
और बांध देती है इनकी थिरकनों को
जो बांध देती हैं तुम्हारे हाथों को
और इनसे जुडे हर सपने को।।
यूं जीवन जिया तो नहीं जाता
एक हद के आगे चीजों को सहा नहीं जाता।
क्यूं आसमान समेटा तुमने अपना
दूसरों की जमीन के लिए?
क्यूं नहीं रोका खुद को तुमने
अपने सपनों के लिए ?
_आलोक सिंह


