प्रेमभाव क्रोध पर भारी, क्रोध भाव प्रेम का दुश्मन

प्रेम करहुँ या क्रोध करहुँ, कभी समझ पावे न ये मन


दुजन को न देखिए, कौन चले किस और

अपनी राह बनाइये, मन पापी मन चोर


ध्यान लगाय कर्मो पर, रख निरोगी काया

मन की राह नेकी रख, साथ न जावे माया


आशा तृष्णा न मरी, मर मर गए शरीर

माया मरी न मन मरा , मर गया सन्त कबीर