हमने ही अपने श्रम से महलों के दुर्ग बनाये हैं।
अपने शोणित से सींच धरा को हमने फसल उगाए हैं।।
उद्योगों में हमने ही मेहनत से यंत्र चलाये हैं।
दुनिया भर के बोझ हमी ने हंसते हुए उठाये हैं।
।।आज मुसीबत आन पड़ी तो,क्यों हम हुए पराए हैं??
रोजी-रोटी की तलाश में छोड़ गाँव हम आये है।
परिजनों की जिम्मेदारी आशाएं संग लाये हैं।।
प्रेम, परिश्रम और निष्ठा से निलय नवीन बसाए हैं।
अपना मानकर शहरों से भी रिश्ते सदा निभाये हैं।।
।।आज मुसीबत आन पड़ी तो, क्यों हम हुए पराए हैं??
हमसे ही संसद की गलियाँ, हमसे ही सरकार बनें।
संविधान के सफा हमी से तो कर्मठ किरदार बनें।।
सत्ता की कुर्सी के भी तो हम ही पाए चार बनें।
लोकतंत्र पर आज हमारा भोजन ही क्यों भार बने।
बोझ बने वो ही जिन्होंने सबके बोझ उठाये हैं।
सड़कों पर पैदल चलते जिन्होंने सड़क बनाये हैं।
।।आज मुसीबत आन पड़ी तो, क्यों हम हुए पराए हैं??


