मेरी कलम से 


स्वार्थ, सियासत राजनीति बस तलवारें दो धारी है।

कोई किसी का सगा नही सत्ता मतलब की यारी है।।

भ्रष्टाचार की गंगा में सब मिलकर करते हैं स्नान।

माया मोह की चक्की में पिसती जनता बेचारी है।।


सत्तापक्ष के पिंजरे में एक तोता बड़ा कमाल है।

उड़ता है जब फिर विपक्ष की धोती बने रुमाल है।।

जुर्म, कांड, घपला, घोटाला, बेनामी संपत्ति हवाला।

बुरे फंसे नेताजी कहते सब धोखा है चाल है।।


लोक लाज, जनता, समाज सब जाए चुल्ही भाड़ में।

लोकतंत्र में जनादेश है हम तो हैं सरकार में।।

एक तरफ सिद्धांत, छवि है दूजी गठबंधन की लाज।

दोराहे पर सुशासन मन मनस रहे टकरार में।।


महत्वाकांक्षी रिश्तों पर फिर आदर्शों की जीत हुयी।

छत्तीस का था जिनसे आंकड़ा फिर उनसे ही प्रीत हुयी।।

देख सियासत का ये ड्रामा लोकतंत्र है सदमे में।

राजनीति के रंगों से अब गिरगिट भी भयभीत हुयी।।


#जय_हिंद