जीवन की आपाधापी में,
कभी किया खुदी पर गौर नहीं।
बहुत हुए शिकवे गिले।
किश्मत से शिकायत और नहीं।।
।।। अब और नहीं ।।।
दोष लकीरों पर मढ़कर,
मेहनत को सदा नाकारा है।
कभी दिमाग की सुना नहीं,
और दिल तो अपना आवारा है।।
रस्ते सब हैं अंजान और,
मंजिल का कोई ठौर नहीं।।
।।। अब और नहीं ।।।
अहम् की पट्टी आँखों पर,
निज स्वार्थ ह्रदय पर हावी है।
कर्म शिथिल मृत प्राय हुआ,
हार अवश्यम्भावी है।।
लक्ष्य सधे या लहू जमे।
अब जीत की विकृत दौड़ नही।।
।।। अब और नहीं ।।।
मंदिर मस्जिद में जंग छिड़ी,
न राम युसूफ अल्लाह रहे।
धर्म जात के आगे चलता,
इंसानियत का जोड़ नहीं।।।
।।। अब और नहीं ।।।
