सुनाई देती हैं,
सिसकियां मजबूरियों की,
बेहद क़रीब होकर बेइंतेहा दूरियों की,
तू ही बता सोचा था क्या??
ये भी होगा??
इतने क़रीब होकर यूँ बेबसी से बँधा होगा???
लेकिन सच बताना आवाज़ तो आती होगी,
एक झंकार सी न दिखने वाली बेड़ियों की,
दम घुटता है साँस नहीं आती है,
आती है कुछ तो बस याद तेरी आती है,
लेकिन सच बताऊँ महसूस तड़प होती है,
पिंजरे में बंद परेशां नन्ही सी चिड़ियों की,
सुनाई देती है सिसकियां सपनों की,
जिनकी उड़ान अभी बाकी है,
तेरे नाम से ही पिंजरे में बंद चिड़िया मे जान अभी बाकी है।।


