स्वार्थ की आँच पर हर रिश्ता पकता है।
हकीकत कुछ और सामने कुछ और दिखता है।।
मारना पड़ता है ज़मीर को अपने।
तब जाकर आज कोई नेता बनता है।।


स्वार्थ की आँच पर हर रिश्ता पकता है।
हकीकत कुछ और सामने कुछ और दिखता है।।
मारना पड़ता है ज़मीर को अपने।
तब जाकर आज कोई नेता बनता है।।