पूरब में उगता हुआ सूरज जैसे कह रहा है
तू क्यों रुक गया है बंदे , जब मैं चल रहा हूँ ,
मैं रोज उगता हूं , चलता हूँ , ढल जाता हूँ ,
नित - नित नियम यही है , फिर भी ऊबता नहीं हूं ,
मेरे भी रास्ते मे रुकावटें है , बादलों का घेरा है ,
राहु-केतु ग्रहण बने , कई बार रोका सवेरा है ,
मैं हर रोज ऐसी रुकावटों पर ठोकरें मारता हूँ ,
मैं रोज उगता हूँ , चलता हूँ , ढल जाता हूँ ,
रोशनी के पथ का अडिग राही मैं चलता जाता हूँ
तू क्यों रुक गया बंदे जब मैं चलता जाता हूँ......


