दिल की भाषा हो जहां, जहां तनिक भी ना स्वाभिमान,
उस रिश्ते को "यारी" कहते ,जहां बीच ना आए अभिमान।
ना ऊंचा ,ना नीचा,ना जाति का बंधन,
जिस यारी के कायल थे स्वयं देवकीनंदन।
यारी, दोस्ती, मित्रता का बंधन युगों से चला आ रहा,
धन्य है वह मानव , जो निस्वार्थ इसे निभा रहा।
घर से दूर , अपनों से परे ऐसा हो कोई खास,
कैसी भी मुसीबत क्यू ना हो , जिसपर कर सके विश्वास।
खुशियों की पोटली हो जहां , नतमस्तक हो जाए गम,
उसी रिश्ते को" यारी "कहते, जहां मिल सुख दुख बांटे हम।


