तुम बैठो सामने तो इक ग़ज़ल लिखूँ
तुम्हारी आँखों को झील
तुम्हारे होठों को कमल लिखूँ
तुम पर क्या कम लिखूँ
थोड़ा आज लिखूँ थोड़ा कल लिखूँ
सिर्फ़ एक ग़ज़ल लिखने से क्या होगा
सोचता हूँ तुम पर ग़ज़ल की एक किताब लिखूँ
तुम पर जब लिखूँ तो बेहिसाब लिखूँ
शर्म से लाल गालों को गुलाब लिखूँ
मैं तुमसे कुछ सवाल करूँ
अगर दे दो तो जवाब लिखूँ
कल रात देखा था जिसमें तुम्हें
इस किताब में वो ख़्वाब लिखूँ
पलकें उठें तुम्हारी तो सुबह लिखूँ
जो गिरें पलकें तो शाम लिखूँ
यूँ तो ग़ज़ल मैं लिखूँ मगर
लिखने वाले की जगह तुम्हारा नाम लिखूँ
तुम हो बेशक़ीमती तो ग़ज़ल भी बेशक़ीमती होगी
तुम्ही बताओ इस किताब का मैं कैसे दाम लिखूँ
तुम्हारी गर्दन को मैं सुराही लिखूँ
तुम्हारे चेहरे की मासूमियत को
तुम्हारे दिल की बेगुनाही लिखूँ
तुम्हें देखूँ तो बस मैं देखूँ
किसी और के देखने की मनाही लिखूँ
तुम्हें राह, तुम्हें ही मंज़िल
तुम्हें अपना हमराही लिखूँ
तुम्हारी पायल की झंकार को
मैं वीणा की तान लिखूँ
मैं हो जाऊँ कोई योगी
फिर करके तुम्हारा ध्यान लिखूँ
तुम हाँ करो या न करो
मैं तुम्हें अपना मान लिखूँ
सब कुछ समझ जाओगी तुम सुनकर ग़ज़ल मेरी
बनी रहोगी फिर भी अनजान लिखूँ
तुम्हारी आँखों में आँखें डाल लिखूँ
तुम हो अगर सुनने को राज़ी
तो मैं ग़ज़ल बड़ी कमाल लिखूँ
हो न जाये कहीं गलती से गलती
मैं कलम बहुत सम्भाल लिखूँ
तुम्हारी क्या मिसाल दूँ
तुम्हें बेमिसाल लिखूँ