नहीं है इक पल तुमसे रहना दूर मुझे
रात की सारी शर्तें हैं मंज़ूर मुझे
वो रस्ता जो ज़ुल्फ़ तुम्हारी बाँटता है
उस रस्ते में भरना है सिन्दूर मुझे
उठी थी पलकें, आँख लड़ी थी, इश्क़ हुआ था
ज़ख़्म वो बनते दिखता है नासूर मुझे
मैं प्यार नहीं करने वाला आसानी से
एक काम करो तुम कर डालो मजबूर मुझे
जिसके चेहरे पर बहुत सादगी रहती है
वही साँवली लड़की लगती हूर मुझे