कुछ बेघर हुए परिन्दे भी जब एक पेड़ कटा और छाँव गयी जिस पेड़ की छाया में सब लोग सुस्ताने आते थे उस पेड़ का फल सब खाते थे उसी पेड़ की जड़ से कुछ चौपाये बाँधे जाते थे जिस पेड़ की शाखों पर सावन में कोयल गाती थी वह राग सुहाना सुनकर कानो में मिसरी-सी घुल जाती थी कभी तेज़ बारिश में कुछ काॅलेज जाने वाले उस पेड़ के नीचे रुक जाते थे शरमाते थे घबराते थे वो नज़रों में बतियाते थे उसी पेड़ की सूखी डाली से चूल्हा गरीब का जलता था सोचो एक ज़रा-से पेड़ से कितनों का जीवन चलता था अब वहाँ नहीं वो पेड़ रहा वो पेड़ कटा कागज़ है बना जिस कागज़ पर तुमको ख़त था लिखा उस ख़त को तुमने जला दिया जो लिखा था सब मिटा दिया पेड़ों का कटना स्वीकार नहीं सो प्यार करो इज़हार नहीं क्योंकि दिलों के रिश्ते, रिश्ते न होकर​ जैसे कि अभिशाप हुए एक तुम्हारे न करने से सोचो कितने पाप हुए