भूल अपनी कुछ यूँ सुधारी मैंने उसकी तस्वीर दिल से उतारी मैंनें वो पेड़ मुझ पर गिरने वाला था सो चला दी उसपे आरी मैंने तुमने फिर उलझा ली ये ज़ुल्फ़ें जो उँगलियों से थी सँवारी मैंने किसी ने पूछा ख़ुदा के बारे में और बना दी सूरत तुम्हारी मैंने मेरे क़ातिल के हाथ ख़ाली थे उसे दे दी छूरी,बरछी,कटारी मैंने 'मीरजी' नातवाँ नहीं है 'रूहदार​' उठा लिया है ये पत्थर भारी मैंने