मुझको श्रेष्ठ कवियों में ।
सम्मान मिले ना चाह मेरी।
शब्दों का गहरा सागर हूं
ना जान सकोगे थाह मेरी।
जिनको शोहरत से प्यार बहुत।
जाओ उनका सम्मान करो।
हैं चाटुकारिता जो पसंद।
जाओ उनका गुणगान करो।।
मैं लावारिस सा तुच्छ कवि ।
ना करो दोस्त परवाह मेरी ।।
मैं हूं साहित्य पुजारी ।
कविता मेरे पूजन की थाली ।।
हर बात तोल करके लिखता ।
करता शब्दों की रखवाली ।।
साहित्य मेरा जीवन बसंत ।
कविता श्रृष्टि का आदि अंत।
शब्दों से होली करता हूँ ।
शब्दों से ही दीवाली ।।
मैं पथिक नहीं उस मंजिल का।
जिसपर चलती दुनिया सारी ।
मैं चैनोअमन का वाशिंदा ।
है हटकर सबसे राह मेरी ।।
मुझको श्रेष्ठ कवियों में ।
सम्मान मिले ना चाह मेरी ।।