तारीख


यह सूरज तो हर दिन

उगता है।

चांद भी समयानुसार

अपनी शीतलता बिखेरता है।

पर यह खास तब बन जाती है

जब इस पर किसी तारीख को

हुई घटना की मोहर लग जाती है।


हो सकता है

किसी रोज़ सूरज की उग्र तापबल के दिन

आपको नौकरी की मंद बयार सी

खबर मिले।

या हो सकता है

किसी रोज़ रोग ग्रस्त ठन्ड सुबह के दिन

आपको टूटे शरीर सी

किसी अपने के देहांत की खबर मिले।


ऐसी खबरों के मिलने पर

हमारी आंखें कैलेंडर की

तारीख को ढूंढ़ती है।

तराजू लेकर तौलते हैं हम

पुरानी यादों से भरी उसी तारीख को

अतीत की झाड़ियों से भरी गुफा में।


घटनाभरी वह तारीख

हमारे जीवन - पुस्तक में

इतिहास में तब्दील होती रहती है

आहिस्ते - आहिस्ते ।


ऐसी ही तारीखों का जमावड़ा

कई तारें बन

जीवन आकाश में चिपक जाते हैं

ताकि

जब खुद के तारे बनने का समय आए

तब अंतिम बार

उन तारों से खचाखच भरे आसमान को

महसूस कर

आंखें मूंद लूं

शनै: शनै: ।


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© संदीप बोस