क्या खोया क्या पाया
इंसान
ज़िंदगी में जितना
आगे है बढ़ता
वो ज़्यादा है खोता
और पाता बहुत ही कम ।
इंसान
गर खोए हुए को
ढ़ूंढ़ने चले तो
पाए हुए को
खो देता है हरदम ।
इंसान
गर पाए हुए को
लेकर चलने लगे
तो खोया हुआ
दिल को चुभाती हर पल ।
इंसान
इस खोने-पाने की
जद्दोजहद में
अनवरत है उलझते रहता
और फिर पंचतत्व मेें जाता है पिघल ।
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संदीप बोस


