अल्पविराम
धूल की परतों से
ढके थे मेरे शब्द
मकड़ी के जाल में
फंसे थे मेरे विचार ।
इधर - उधर अव्यस्थित सा
बिखरे थे मेरी इच्छाएं
कबाड़ में तब्दील हो गई थीं
मेरी अप्रकाशित अनामिकाएं ।
मेरी सोच
बंद कमरे में छटपटा रही थीं।
मेरे बोल
सरकारी फाइलों में तमतमा रही थीं ।
मेरे शब्द
घास सरीखी लातें खा रही थीं।
मेरे विचार
अंधेरे गुफा में रास्ता ढूंढ़ रही थीं।
फिर
जैसे,
कई दिनों बाद घर आकर
हम शनै: शनै: घर साफ करते हैं
धूल झाड़ते हैं
मकड़ी के जालों को साफ करते हैं
चीज़ों को करीने से सजाते हैं ।
ठीक वैसे ही
कमरे की कुंडी खोलकर
सरकारी फाइलों से निकालकर
घास को बचाकर
गुफा में रोशनी दिखाकर
लाना है फिर से
सजाना है फिर से
सोच, बोल, शब्द, विचार ।
© संदीप बोस।


